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देसी बीजों से मोटे अनाजों की खेती और मार्केटिंग कर रहे 56 वर्षीय आनंद मुरारी

बीज जितना छोटा होता है, वह उतना ही देसी होता है

मोकामा में मोटे अनाजों के फायदे बताने के लिए करते हैं खिचड़ी और खीर पार्टी

लोग कहते हैं आप खेती में क्या ही कमा लेते होंगे, हम कहते हैं स्वास्थ्य कमाते हैं। क्योंकि स्वास्थ्य ही धन होता है। मैंने रसायनशास्त्र से मास्टर्स किया कहै। नौ साल पहले तक एक शिक्षक और दवा का कारोबार करता था। लेकिन 2015 में बेटी की शादी की और बीमार रहने लगा तो महसूस हुआ कि स्वास्थ्य ही सबकुछ है। तब से खेती में पूरी तरह रमा हूं। आज तीन एकड़ खेत में देसी बीजों से धान, गेहूं, राई, बाजरा, ज्वार, कुट्टु और मड़ुआ की खेती कर रहा हूं। यह कहना है मोकामा के प्रगतिशील किसान आनंद मुरारी का।

56 साल की उम्र में आनंद मुरारी गांव में मोटे अनाजों की खेती करने के फायदे बताते हैँ और समय-समय पर मोटे अनाजों की खिचड़ी और खीर की पार्टी देकर लोगों को जागरूक करते हैं। वह कहते हैं उनके किचेन में हर चीज उनके खेत से उपजा हुआ जहरमुक्त है।

पहली बार बिहार में लगाई कुट्टू की फसल

हिमालय की तराई में उत्पादित होने वाली कुट्टू की फसल को पहली बार मोकामा में लगायी। यह एक औषधीये फसल होती है, लोग इसका इस्तेमाल फलाहार के रूप में करते हैं। आनंद मुरारी में पहली बार कुट्टू की फसल लगायी और उत्पादन भी अच्छा हुआ है। वह बताते हैं कि बिहार की मिट्टी में सभी तरह की फसल की खेती हो सकती है तो कुट्टू क्यों नहीं हो सकता है। यह सोचकर बीज बोया था। यह फसल 80-100 दिन में तैयार हो जाता है। इस फसल के 20-25 डिग्री तापमान होना चाहिए।

मोटे अनाजों की करते हैं मार्केटिंग

आनंद मुरारी बताते हैँ कि वह गांव में ही मोटे अनाज का एक शॉप खोले हुए हैं। इसमें सामा, कोदो, कौनी, मड़ुआ, मक्का, कुटकी, खेरही, ज्वार-बाजरा ब्राऊन की मार्कटिंग करते हैं। गुजरात, राजस्थान के किसानों से मोटे अनाज खरीद कर मार्केटिंग कर रहे हैं। लोगों को सस्ते दर मुहैया कराने के लिए बाजार से 10 प्रतिशत कम कीमत पर बेचते हैं।

देसी बीजों को संग्रहित कर रहे हैं आनंद मुरारी
आनंद मुरारी बताते हैं कि वह अपने खेतों में देसी बीजों को ही लगाते हैं। वह देश के कोने-कोने में घूम-घूमकर देसी बीजों को संग्रहित किये हैं। उनके पास गेहूं की सोनामोति बीज है। जिसे पैंग्बरी गेहूं भी कहते हैं। यह गोल-गोल धनिया के साइज का होता है। उनके पास देसी मक्का के बीज का 20 प्रजाति है। काला, मैरून, पीला, उजला और मिक्स रंग का मक्का का बीज है। वह कहते हैं बीज जितना छोटा होता है, वह देसी होता है। उनके पास राई, सरसो की तरह की वेराइटी के बीज है। गुच्छे वाली सरसो, जटही सरसो और आम सरसो भी है। उनके पास काला नामक वाली धान की वेराइटी भी है।यह देसी धान की वेराइटी है। वह बताते हैंं जिन्हें मोटे अनाज की खेती करनी होती है, उन किसानों को मुफ्त में बीज भी देते हैं। क्योंकि हमारी खेती जहरीली होती जा रही है। किसी न किसी को प्रयास करना होगा, तभी आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ जीवन दे पाएंगे।

एक बेटा और एक बेटी है, दोनों को पैरों पर खड़ा किया

वह बताते हैं कि उनको एक बेटा और एक बेटी है। बेटा पटना में बड़े कोचिंग में फिजिक्श का शिक्षक है और बेटी ताप्ति भारद्वाज दिल्ली में रहती है। बेटी प्लाज्मा में पीएचडी कर रही है। वह बताते हैं कि खेती में नवाचार के लिए बिहार सरकार ही केन्द्र से भी कई प्रकार के पुरस्कार मिले हैं।

देसी बीजों से मोटे अनाजों की खेती और मार्केटिंग कर रहे 56 वर्षीय आनंद मुरारी

18 से 65 साल की उम्र तक