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बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलसचिव बर्खास्त, 11 महीने से जीवनयापन भत्ता भी नहीं

  • कुलसचिव ने कहा; नियुक्ति प्रबंधन बोर्ड ने की, हटाने का सक्षम प्राधिकार भी वही
  • कुलपति पर वैधानिक अनियमितता का आरोप, मीडिया को जवाब नहीं दे रहे

रोहित भारती | पटना

बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय ने कुलसचिव डॉ. संजीव कुमार को सेवा से हटा दिया गया है। डॉ. कुमार का आरोप है कि यह कार्रवाई सक्षम प्राधिकार की स्वीकृति के बिना की गई और निलंबन के दौरान उन्हें 11 महीने से जीवनयापन भत्ता भी नहीं दिया गया, जिससे उनके सामने परिवार के भरण-पोषण और इलाज की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। डॉ. संजीव कुमार के अनुसार, विश्वविद्यालय में कुलसचिव की नियुक्ति प्रबंधन मंडल (बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट) द्वारा की जाती है और बिहार सरकार के सीसीए पत्र-15 के तहत वही नियुक्ति प्राधिकार अनुशासनिक प्राधिकार भी होता है। इसके बावजूद कुलपति ने बोर्ड की स्वीकृति के बिना ही निलंबन आदेश जारी किया।
मई माह में बिहार सरकार द्वारा नामित बोर्ड सदस्यों ने इस निलंबन को मंजूरी देने से इनकार कर दिया और इसकी सूचना कुलाधिपति यानी राज्यपाल को भेजी गई, लेकिन इसके बाद भी निलंबन समाप्त नहीं किया गया।

90 दिन में नहीं दिया आरोपपत्र, जूनियर अधिकारी से कराई आरोपों की जांच
निलंबन की वैधानिक अवधि 90 दिनों की होती है, लेकिन इस दौरान डॉ. कुमार को कोई आरोपपत्र नहीं दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, तय अवधि में आरोपपत्र न दिए जाने की स्थिति में निलंबन स्वतः समाप्त हो जाता है। 17 जून को डॉ. कुमार जब पुनः कार्यभार ग्रहण करने विश्वविद्यालय पहुंचे, तो उन्हें ज्वाइन नहीं करने दिया गया। इसके बाद 20 जून को बिना प्रबंधन मंडल की स्वीकृति के उनके खिलाफ आरोपपत्र जारी किया गया। आरोपों की जांच एक जूनियर अधिकारी से कराई गई, जबकि सीसीए का पत्र- 2011 के अनुसार किसी वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ जांच उनसे सीनियर अधिकारी ही कर सकते हैं।

मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन फिर भी बर्खास्त किया
इन सभी कार्रवाइयों के खिलाफ डॉ. संजीव कुमार ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही 22 जनवरी को विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें सेवा से हटाने का आदेश जारी कर दिया। डॉ. कुमार का कहना है कि मार्च 2025 में वेतन निर्धारण और नामांकन से जुड़े मामलों में उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया गया था, जबकि संबंधित प्रक्रियाएं पहले ही पूरी हो चुकी थीं और वित्तीय मामलों की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार वित्त नियंत्रक की होती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि निलंबन के बाद से अब तक 11 महीनों में उन्हें जीवनयापन भत्ता नहीं दिया गया।

कुलपति ने नहीं दिया कोई जवाब
इस मामले पर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. इंद्रजीत सिंह से कार्यालय जाकर मिलने की व सरकारी नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उनका पक्ष सामने नहीं आ सका।

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