62 साल की उम्र में गंगा नदी में डूबते लोगों को बचा रहे राजेन्द्र सहनी
2017 के पतंग उत्सव हादसा में 19 लोगों का शव गंगा नदी से निकाले थे
30 सालों में अब तक 5 हजार से अधिक डूबते लोगों को बचा चुके हैं गोताखोर राजेन्द्र सहनी
सविता। पटना
गंगा नदी सहित अन्य सहायक नदियां उफान पर है। नदियों की धार कब देखते-देखते लोगों को खुद में समेट ले, यह कोई नहीं जानता है। नदियों के इन्हीं लहरों से लड़कर लोगों को बचाने में लगे हैं पटनासिटी के राजेन्द्र सहनी। 62 वर्षीय राजेन्द्र सहनी अब तक 5 हजारों लोगों की जान बचा चुके हैं। वह कहते हैं कि किसी की जिन्दगी बचाने से बढ़कर कोई काम नहीं। किसी को एक बार डूबने से बचा लिया तो वह जिन्दगी भूल नहीं पाएगा कि हमने उसकी जान बचाई है। वह कहते हैं मैंने पढ़ाई नहीं कि लेकिन धर्म का काम बहुत किया। आज भी साल 2017 के पतंग उत्सव हादसा नहीं भूले है। पतंग उत्सव मनाने के लिए पटना के बहुत सारे लोग नाव से दियारा गए थे। लौटते वकत नाव दुर्घटनाग्रस्त हो गया। 24 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। प्रशासन के आदेश से वह लोगों को बचाने के लिए गंगा नदी में गए। एक के बाद एक शव को निकालते जा रहे थे। देखकर कलेजा फटता था। कई लोगों को जिन्दा भी बचाया, इसकी खुशी थी। लेकिन एक बात का दु:ख है कि सरकार द्वारा सिर्फ प्रशस्ती पत्र दिया गया, किसी तरह की सरकारी मदद नहीं की गई। उनके चार बेटे हैं। मछली बेचकर ही बेटों को पढ़ाया-लिखाया और काबिल बनाया।
नदी में डूबती महिला को बचाया तो मन को खुशी हुई
राजेन्द्र सहनी बताते हैं कि साल 1994 था। वह गंगा नदी में मछली मारने के लिए जाल बिछाए हुए थे। नाव को एक किनारे कर रहे थे। कार्तिक पूर्णिमा का दिन था। नाव को बांध रहे थे तो देखा कि गंगा में नहा रही एक महिला डूब रही है। उस महिला को नदी में कूदकर बचाया। उसके बाद घास गढ़नी वाली सात महिलाओं को बचाया। यह सिलसिला आज भी कायम है। वह कहते हैं जब तक हड्डियों में जान है ,लोगों को बचाने का काम करते रहेंगे।
एक साल से सरकार से पैसा नहीं मिला
राजेन्द्र सहनी जाने-माने गोताखोर हैं। वह बताते हैं कि हर साल सरकार उन्हें छठ, व्रत और त्यौहार के समय लोगों की जान बचाने के लिए काम पर बुलाती है, लेकिन समय पर पैसा नहीं देती है। जिला प्रशासन के पास एक साल रुपए का बकाया है। अपना पैसा लेने के लिए सरकारी कार्यालय का चक्कर लगाने को मजबूर हो रहे हैं।
ट्रेंड गोताखोरों की स्थायी बहाली नहीं करती है सरकार
गोताखोर नदियों में पानी के हाऊ-भाव से समझ जाते हैं कि नदी में कहां कितनी गहराई है और धार कैसी है। राजेन्द्र सहनी बताते हैं कि नई पीढ़ी के लड़के गोताखोर नहीं बनना चाहते हैं। गोताखोरी का काम सिर्फ मछुआरा समुदाय के लोग ही करते हैं। युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए स्थायी गोताखोरों की नियुक्ति करनी चाहिए। लेकिन सरकार सिर्फ कांट्रेक्ट पर ही बहाल करती है, उसमें भी पैसा समय पर नहीं देती है।
गंगा नदी में अब नहीं आती है हिलीस मछली
गंगा नदी में अब हिलसा मछली नहीं मिल रही है। फरक्का बराज बनने के कारण कई नदियों का पानी गंगा नहीं आती है। सोन नदी का पानी सोना कहा जाता है। सोन नदी का पानी लाल रहता है। इसमें मछलियां अधिक आती थी। सोन नदी की धार बदलने से गंगा नदी में मछलियों की संख्या कम हो गई है। दूसरा कारण गंगा में बढ़ा रहा है प्रदूषण भी है। इससे मत्स्य पालन का काम प्रभावित हुआ है।



















































































