गुजरात के अलंग में जहान काटते हुए मर चुके हैं 500 से अधिक बुजुर्ग श्रमिक
- बिहार के करीब 30 लाख मजदूर दूसरे राज्यों में काम करते हुए मरते हैं तो राज्य सरकार क्यों नहीं जागती है?
- इमिग्रेशन सर्टिफिकेट लेकर साल 2022 में 60945 जदूर विदेश गए थे काम करने के लिए
- इस साल अब तक 17701 मजदूरों ने लिया है इमिग्रेशन
- बिहार से पांच हजार से अधिक मजदूर गुजरात के अलंग बंदरगाह पर समुद्री जहाज काटने का काम करते हैं
सविता। पटना
विदेशों में मजदूरों की मौत होती है तो देश और राज्य दोनों ही जागता है। लेकिन पिछले पांच साल में 521 बिहारी मजदूरों की मौत दिल्ली, मुम्बई, हैद्राबाद, चेन्नई जैसे राज्यों काम करते हुए हो गई है। इसके बाद भी इन मजदूरों की ट्रैकिंग के लिए न तो अब तक कोई योजना बनी है और न सख्त नियम। इन मौतों पर बिहार कब जागेगा। हैरत की बात यह है कि कितने मजदूर दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं इसका कोई रिकार्ड श्रम विभाग के पास नहीं है। जबकि विदेशों में काम करने वाले दसवीं से कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए इमिग्रेशन क्लिरेंस लेना जरूरी होता है, ताकि मजदूरों को कम पढ़ा-लिखा समझकर कोई धोखेबाजी न हो। वहीं बिहार के मजदूर गुजरात के अलंग में जहरीले समुद्री जहाजों को काटने का काम करते हैं। छपरा, सीवान, नवादा, शेखपुरा के पांच हजार से अधिक मजदूर जहरीले समुद्री जहाज काटने का काम कर रहे हैं। पिछले पांच सालों में समुद्री जहाज काटते हुए 500 से अधिक मजदूरों की मौत हो चुकी है। उन्हें मुआवजा के तौर पर एक लाख रुपए मिलते हैं। मजदूर जहां काम करते हैं वहां न पीने का पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं हैं।
गुजरात के अलंग से लौटकर आए छपरा और सीवान के मजदूरों ने कहा मुआवजा न देना पड़े, इसलिए एजेंसी वाले जला देेते हैं आधार कार्ड
बिहार में काम मिलता तो गुजरात में जहरीले समुद्री जहाजों को काटने क्यों जाते। समुद्री जहाजों को काटना हमारी मजबूरी है,यह कहना है छपरा के मांझी प्रखंड के दुमाईगढ़ गांव के नगीना सिंह का। नगीना सिंह25सालों तक गुजरात में समुद्री जहाजों को काटने का करते और कराते रहे। साल2018में काम छोड़ दिया। क्योंकि कंपनी वालों ने काम का पैसा देने से इनकार कर दिया। तीन लाख रुपए के लिए गुहार लगाते रह गए। अंत में काम छोड़कर आ गए। नगीना सिंह के साथ उनके भाई जनक सिंह भी समुद्री जहाज काटने का काम करते थे और एक भाई राम कुमार की मौत वहां काम करते हुए फेफड़े की बीमारी से ग्रसित होकर हुई थी। इस मौत के बाद इस गांव के दर्जनों लोगों ने काम छोड़ दिया,क्योंकि कंपनी ने मुआवजा देने से इनकार कर दिया था। नगीना सिंह बताते हैं कि आज भी छपरा और सीवान के500 से अधिक मजदूर गुजरात के भावनगर जिला अलंग समुद्री तट पर जहाजों को काटने का काम कर रहे हैं। जहां बीमार पड़ने या दुर्घटना होने पर भगवान भरोसे ही रहना पड़ता है,क्योंकि इलाज के नाम पर सिर्फ रेडक्रॉस है। कोई जिम्मेवारी लेने वाला नहीं है। जनक सिंह बताते हैं कि समुद्री जहाजों को काटने में जिन्दगी लगा दी, लेकिन सुरक्षा में एक चूक से मौत होने पर जिम्मेवारी लेने वाला कोई नहीं होता। वहां मौत होते ही मजदूरों के साथ आधार कार्ड जला दिया जाता है। आज भी बिहार-झारखंड और यूपी के एक लाख से अधिक मजदूर गुजरात में जहरीले समुद्री जहाजों को हाथ से काटने का काम कर रहे हैं।
बीमार पड़ने पर कोई देखने वाला नहीं
वहीं से कुछ दूर हमने सीवान के दरौंदा बगौरा गांव के बिहारी यादव से बात की। वह बताते हैं कि पिछले एक साल से गांव में ही है। जहाज काटने के दौरान वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। देखने वाला भी कोई नहीं था, जैसे-तैसे बेटे के बुलाकर वापस लौटा। तब से इलाज करा रहे हैं। छपरा के रसूलपुर गांव के सुरेश यादव बताते हैं कि अलंग में काम कराने वाली कंपनी मजदूरों का पैसा काट लेती है। दर्जनों मजदूर परेशान होकर मुम्बई, चेन्नई और कोलकात्ता चले गए हैं। मैं वापस नहीं जाना चाहता हूं। लेकिन पीएफ का पैसा फंसा है। इसलिए जाना जरूरी है। वह बताते हैं सारे जहाज विदेशों के होते हैं। मजदूरों को मानेमाने तरीके से कंपनी वाले पैसे देते हैं। जब मजदूर अधिक हो जाता है तो तीन सौ रुपए में काम करवाते हैं। जरूरत पड़ने पर700रुपए भी देते हैं। अमोनिया गैस ढोने वाले जहाज को भी काट चुके हैं। 152 कंपनियां गुजरात में काम कर रही है। लेकिन एक भी सरकारी अस्पताल अलंग में नहीं है। सीवान के बगौरा के सराली यादव बताते हैं कि पहले की अपेक्षा सुविधाएं बढ़ी है। लेकिन नियम नाम का कोई चीज नहीं है समुद्री जहाज काटने में। कंपनियों के मनमाने तरीके के काम लेने की वजह से मजदूर पलायन कर रहे हैं। एकदम मजबूर मजदूर ही गुजरात में काम करने जा रहे हैं।
खुजली,दमा और कम पानी पीने से किडनी हो रही खराब
समुद्री जहाजों को काटने का काम जितना जोखिम भरा है,उतना ही स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। समुद्री पानी के कारण मजदूरों को खुजली जैसी बीमारी हो जाती है। सबसे अधिक शिकायत फेफड़ा संबंधित बीमारी है। समुद्री जहाजों से निकलने वाले जहरीले गैस और पदार्थ को सूंघने के कारण उन्हें दमा हो जाता है। यही नहीं पीने के लिए वहां सिर्फ कुएं का पानी मिलता है। इसके कारण मजदूर कई घंटों बिना पानी पिए काम करते हैं। उन्हें कई तरह की बीमारी हो जाती है। अधिकतर मजदूर किडनी की समस्या से पीड़ित होते हैं। रसूलपुर के सुरेश यादव बताते हैं कि इलाज के लिए सिर्फ रेडक्रॉस है। किसी भी सरकारी अस्पताल से जोड़ा नहीं गया है,इसके कारण मजदूर परेशान होकर काम छोड़ देते हैं।
सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक हेलमेट
समुद्री जहाज काटने का काम गैस कटर से किया जाता है। यहां एक तार भी टूट जाता है तो उसी समय मजदूर की मौत हो जाती है। सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक हेलमेट रहता है। जबकि हर पल जोखिम और खतरों से खेलना पड़ता है।
जनहीत मामलों के वकील गोपाल कृष्ण बताते हैं कि दूसरे देशों में मजदूर लॉ बहुत मजबूत है और जहाज काटना बहुत महंगा होता है। इसलिए भारत के बंदरगाहों पर बहुत ही कम पैसे में मजदूर मिल जाते हैं और उन मजदूरों के लिए बने कानून सख्त नहीं है। इसके कारण समुद्री जहाज काटने का काम अप्रवासी मजदूरों द्वारा करवाया जाता है। भारत में अप्रवासी मजदूरों के लिए व्यावसायिक सुरक्षा स्वास्थ्य और कार्य की दशाएं संहिता2020में प्रावधान दिए गए हैं। लेकिन प्रावधानों को लागू नहीं किया गया है। इसे लागू करने की जिम्मेवारी गुजरात सरकार की है। और बिहार सरकार को भी चाहिए कि ऐसे मजदूरों का डेटा बेस बनाए और सुरक्षा कानूनों को लागू करने को लेकर तत्पर रहे। वह बताते हैं कि सरकारी उदासिनता के कारण समुद्री जहाजों के कब्रगाह के साथ-साथ अलंग का समुद्री तट अप्रवासी मजदूरों का कब्रगाह बनता जा रहा है। बिहार से पांच हजार से अधिक मजदूर गुजरात समुद्री जहाज काटने का करते हैं काम। बता दें कि समुद्री तट पर कभी भी मजदूर स्थायी नहीं रहते हैं। जब जरूरत पड़ती है मजदूरों को बुला लिया जाता है।
इन जगहों के मजदूर करते हैं काम
मुंगेर,छपरा,सीवान और नालंदा के मजदूर करते हैं समुद्री जहाज काटने का काम
छपरा के रसूलपुर,दुमाईगढ़ और एकमा,सीवान के दरौंदा
इनकी हो चुकी है मौत :राम कुमार राय,लालीजी
बिहार से बाहर इतने मजदूरों की हुई है मौत
2018-19: 121
2019-20 : 99
2020-21:91
2021-22: 74
2022-23: 136





















































































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