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इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ 51 वर्षीय रामजीत खेत में चमका रहे किस्मत

10 एकड़ जमीन पर धान, गेहूं के साथ हरी खाद का कर रहे हैं उत्पादन

विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स ने भी खेती के लिए सम्मानित किया रामजीत शर्मा को

सविता। पटना

खेतों में धान और गेहूं की बालियां लहलहाती है तो गांव में खुशियां मनायी जाती है। अगर इन बालियों से दाने ही नहीं निकले तो किसानों को जीते जी मरने से कम नहीं होता। इस परिस्थिति को बदलने के लिए बक्रम प्रखंड के बाघाकोल फरीदपुर के रामजीत शर्मा ने बीज उत्पादन में हाथ आजमाया। आज वह 10 एकड़ जमीन पर 100 क्विंटल आधार बीज बोरलॉग इंस्टीट़यूट ऑफ साऊथ एशिया को 100 क्विंटल बीज देते हैं। इसके अलावे अन्य किसानों से भी बीज का उत्पादन कराकर सरकार को दे रहे हैं। इससे पहले बिहार राज्य बीज निगम और राष्ट्रीय बीज निगम को बीज देते हैं। साथ में गांव के जरूरतमंद किसानों को बीज उपलब्ध करा रहे हैं। धान के बीज के उत्पादन में उल्लेखनीय काम के लिए रामजीत शर्मा को 2014 में भारतीय कृषि अनुसंधान के रिसर्च केन्द्र सबलपुरा में बिल गेट्स से मिलने का मौका मिला। इसके साथ वायर क्रॉप साइंस की ओर से धान उत्पादन के क्षेत्र में पुरस्कृत भी किया जा चुका है। रामजीत शर्मा खेती के बदौलत साल के चार-पांच लाख रुपये आमदनी कर रहे हैं। जिससे दो बच्चों अच्छी शिक्षा दे रहे हैं। आज रामजीत शर्मा से प्रेरणा लेकर गांव के कई युवा बीज के उत्पादन में लग चुके हैं।

मिलेनियर फार्मर ऑफ इंडिया का अवार्ड

साल 2024 में दिल्ली आईसीएआर ने मिलेनियर फार्मर ऑफ इंडिया का अवार्ड दिया गया है। खेती में किए गए नवाचार को लेकर यह सम्मान उन्हें दिया गया है। इसके अलावे अंतरराष्ट्रीय आलू अनुसंधान केन्द्र के स्मारिका में सफलता की कहानी भी छप चुकी है। उन्हें विश्व के सबसे अमीर व्यक्ति बिल गेट्स ने भी खेती के लिए सम्मानित किया है।

इंजीनियर बनने का सपना छोड़, की खेती

बिहटा जीजे कॉलेज से गणित में स्नातक रामजत शर्मा बताते हैं उनके पिता और दादा खेती करते थे। वे पढ़-लिखकर इंजीनियर बनना चाहते थे। लेकिन, उनकी किस्मत खेती कब मुड़ गई, पता भी नहीं चला।। धान और गेहूं के बीजों में नकली बीज मिले रहते थे। इसकी जांच बिहार राज्य बीज निगम से करवायी। कृषि विश्वविद्यालय सबौर से एमटीयू 1001 प्रजाति के धान के 10 क्विंटल बीज लिया। और बिहार बीज निगम को छह सौ क्विंटल बीज उत्पादित कर दिया। वह बताते हैं कि वह खेतों में रसायनिक खाद के बदले मूंग और धैंचा का उत्पादन कर हरी खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इससे खेत की उर्वरा शक्ति बरकरार रहती है।

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