80 साल की उम्र में सेवानिवृत्त इंजीनियर ललन प्रसाद सिंह ने फिलाटेली में जीता गोल्ड

  • डाक टिकट संग्रह चिड़ियां क्यों, कैसे और कहां को जीवंत कर, प्रकृति प्रेम को दिखाया
  • बिहार में पुल निर्माण विभाग से सेवानिवृत्त ललन प्रसाद सिंह ने ही अधिकांश बड़े पुलों को डिजाइन किया है

सविता।पटना

उम्र 80 साल और जुनून पक्षियों की दुनिया को जानने और समझने की। पक्षियों का हमारे जीवन में क्या महत्व रहा और चिड़ियों ने कैसे प्रकृति को संतुलन बनाए रखने में योगदान दिया है, इस पर ये देश-दुनिया से डाकटिकटों का संग्रहण करते हैं। इनके पास ऐसे-ऐसे दुर्लभ डाकटिकट हैं, जिनकी कीमत लाखों रुपए हैं। डाक टिकटों में और चिट्ठियों को पहुंचाने में पक्षियों का इस्तेमाल कैसे किया जाता था, इनके डाक संग्रहण में कहानियों के रूप में दिखाया गया है। पटना के रहने वाले 80 वर्षीय ललन प्रसाद को पक्षी क्यों और कैसे विषय पर डाक टिकट संग्रह को विश्वस्तर पर गोल्ड मेडल मिला है। कोरिया में आयोजित विश्व प्रतियोगिता में उन्हें यह गोल्ड मेडल मिला है। वह पिछले 40 सालों से देश-दुनिया में पक्षियों पर जारी अमूल्य डाक टिकट, लिफाफा और पोस्ट कार्ड का संग्रहण किया। पक्षियों के अस्तित्व से लेकर आज के समय में पक्षियों के खत्म होने तक का सफर को दिखाया है। ललन प्रसाद पुल निर्माण विभाग से सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर रहे हैं।

इंजीनियर रहते हुए पक्षियों और प्रकृति प्रेम जागा

ललन प्रसाद सिंह बताते हैँ कि एक इंजीनियर को सड़क, पुल-पुलिया बनाते समय बहुत सारी चीजों का ध्यान रखना पड़ता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण होता है कि सड़क और पुल जहां बन रहे हैं, वहां के इकोलॉजी सिस्टम कैसा है, बनाने के दौरान इनको नुकसान तो नहीं न पहुंच रहा है। इंफ्रास्ट्रक्चर डिजाइन करते हुए नदी, पेड़-पौधे और खेतों को कम से कम नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। कई ऐसी जगहें होती हैं जहां पक्षी या जीवों का आश्रय स्थल होता है, अगर हम उन जगहों को उजाड़ देते हैँ तो वहां का ईको सिस्टम को बर्बाद कर रहे होते हैं। नौकरी के दौरान ही पक्षियों और प्रकृति के प्रति प्रेम जगा, हमने इतिहास के पन्नों में पक्षियों के अस्तित्व को तलाशना शुरू किया। इनके अस्तित्व और जीवंत उदाहरण को प्रस्तुत करने का सबसे आसान तरीका था, डाक टिकट। क्योंकि हर देश किसी न किसी प्रकार से पक्षियों का इस्तेमाल चिट्ठियों को पहुंचाने में करते थे। कबूतर, बाज, चील से लेकर हंसों का इस्तेमाल के कई डाक टिकट और लिफाफे मिले। हम नौकरी करते थे, इतने पैसे नहीं थे कि सारे डाक टिकटों को एक साथ खरीद पाते, इसलिए धीरे-धीरे डाक टिकटों को खरीदा और जब नौकरी से छुट्टी मिली तो इनकी प्रदर्शनी लगानी शुरू की। इसके लिए हमे कई बार डाक टिकटों की प्रदर्शनी में पुरस्कार मिल चुका है।

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