विदेश की नौकरी छोड़ मिथिला मखाना को ब्रांड बना रहे मनीष
- कोरोना काल में किसानों व महिलाओं को जोड़ा रोजगार से
- मधुबनी के जरैल गांव में तालाब से शुरू हुई खेती, अब दर्जनभर उत्पाद बना ब्रांड
सविता।पटना
विदेशी चकाचौंध को छोड़ 52 वर्षीय मनीष आनंद बिहार में मखाना को ब्रांड बनाने के काम में लगे हैं। कई सालों तक विदेशों में नौकरी की। लेकिन मन बिहार में रहा। वह मधुबनी जिले के जरैल गांव में अपनी पैतृक पोखर से मखाने की खेती शुरुआत की। आज 50 से अधिक लोगों को रोजगार दे रहे हैं। सात साल में मधुबनी का सबसे बड़ा मखाना पैकेजिंग इंडस्ट्रीज खोल लिया है। सात साल की मेहनत और जुनून ने मखाना को सिर्फ खेत से बाजार तक नहीं पहुंचाया, बल्कि शानदार पैकेजिंग के साथ ब्रांड का रूप दे दिया।
विदेशी नौकरी छोड़ गांव लौटे
मनीष के पिता आरबीआई पटना में पदस्थापित थे। उनकी पढ़ाई पटना और दिल्ली में हुई। इसके बाद वे इंग्लैंड मुख्यालय वाली एक ग्लास कंपनी में नौकरी करने लगे। करीब दस साल तक कई देशों में उनकी पोस्टिंग रही। लेकिन इंडस्ट्री में लगातार बदलाव देखते हुए उन्होंने तय किया कि अब अपनी जमीन से जुड़ना है। गांव लौटे और मखाने की खेती में कूद पड़े।
मखाना से बने दर्जनभर उत्पाद
गांव की पोखर से शुरू हुआ यह प्रयोग अब कारोबार में बदल चुका है। आज मनीष की कंपनी मखाने से करीब दर्जनभर उत्पाद बना रही है। इसमें फूल मखाना, खीर मखाना, एनर्जी शेक, मखाना पाउडर, मखाना सूप और रोस्टेड मखाना जैसे उत्पाद शामिल हैं।
कोरोना काल बना टर्निंग प्वाइंट
कोरोना महामारी के दौरान जब तमाम उद्योग-धंधे ठप हो गए, तब मनीष ने गांव में ही डेरा डाल लिया। उन्होंने किसानों को मखाना की खेती के लिए प्रेरित किया और स्थानीय महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराया। इसी दौरान उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार किया और दूसरों को भी इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
सरकार की नीतियां अच्छी, तंत्र कमजोर
मनीष का कहना है कि राज्य सरकार की नीतियां बेहतर हैं, लेकिन सहकारी तंत्र उन्हें जमीन पर उतारने में नाकाम है। उन्होंने 2016 में पीएमईजीपी के तहत लोन के लिए आवेदन किया था, जो जिला स्तर पर मंजूर भी हो गया। लेकिन बैंक स्तर पर फाइल अटक गई और अब तक लंबित है।
ईकोसिस्टम बनाने की योजना
मनीष की योजना है कि मखाना व्यवसाय को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए एक ईकोसिस्टम तैयार किया जाए। उनकी कोशिश है कि पैकिंग और प्रोसेसिंग की सारी सुविधाएं स्थानीय स्तर पर ही मिलें, ताकि दिल्ली जैसी जगहों पर निर्भरता खत्म हो सके।
- मुख्य बातें
- मधुबनी के जरैल गांव के मनीष आनंद ने छोड़ी विदेशी नौकरी
- गांव की पोखर से मखाना खेती का सफर शुरू
- कंपनी बना रही है करीब दर्जनभर उत्पाद
- सरकारी नीतियों से मदद की उम्मीद, बैंकिंग तंत्र से निराशा



















































































