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पंद्रह सालों से कैदियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं 62 वर्षीय संतोष उपाध्याय

जिनका कोई नहीं है, उनकी जमानत की लड़ाई लड़ते हैं अब तक 200 से अधिक लोगों को दिलाई जमानत

खुद जेल गए तो देखा कैदियों के साथ होता है जानवरों जैसा सलूक

सविता। पटना

मैं साल 2010 में पारिवारिक विवाद में जेल गया था। छात्र जीवन से मानवाधिकार मुद्दों पर काम करते थे। देखा कि यहां मेरा ही कोई अधिकार नहीं है। लेकिन कानून की नजर में मैं गुनाहगार था, इसलिए जेल में रहा। जेल में रहने के दौरान देखा कि जेल में बंद लोग छोटी सी गलती की सजा भुगत रहे हैं। वहां उनके पैर में बेड़ियां और रस्सी बांधे रहते हैं। एक बार जेलर ने एक बंदी को सिर्फ इसलिए पैर में बेड़ी डाल दिया कि उसने जेल कैम्पस के अंदर के पेड़ से आम तोड़ लिया था। हमने इसका विरोध किया तो जेलर ने कहा कि अनुशासन तोड़ेगा तो सजा मिलेगी। हमने अन्य बंदियों के साथ मिलकर पूरा आम ही साफ कर दिया। इसके बाद मुझपर एक और केस हुआ। तब से अब तक बंदियों के अधिकार की लड़ाई लड़ रहा हूं। यह कहना है बंदी बचाओ अभियान के संतोष उपाध्याय का। 62 वर्षीय संतोष उपाध्याय अब तक 200 से अधिक बंदियों की आजादी की लड़ाई लडी और उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़े हैं।

जेल में बंद महिला कैदियों के बच्चों की शिक्षा और पालन-पोषण की लड़ाई लड़ रहे

रोहतास के  डेहरी के रहने वाले संतोष उपाध्याय बताते हैं कि बिहार के जेलों में बंद महिला कैदियों की स्थिति काफी खराब है। वह बच्चों के साथ जेल में रहती हैं। उनके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर पालन-पोषण का अधिकार मर रहा है। इसको लेकर उन्होंने हाईकोर्ट में पीआईएल दर्ज की। महिला बंदियों के इस लड़ाई में उन्हें जीत धीरे-धीरे जीत मिल रही है। अब सभी महिला वार्ड में अलग से किचेन बन गया है। वे जेल के अस्पताल में इलाज करा पाती हैं। इससे उनके अंदर का तनाव कम हो रहा है और अपने साथ हो रही अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा पाती हैं।

हाथ में रस्सी लगाकर कोर्ट हाजत से कोर्ट रूम ले जाने के लिए कर चुके हैं पीआईएल

वे बताते हैं वे कैदियों को जानवरों की तरह बांधकर कोर्ट रूम में ले जाने का विरोध करते रहते हैं। पटना हाईकोर्ट में भी अर्जी लगा चुके हैं। जल्द ही इसपर भी फैसला आएगा।

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