शादी के बाद जिम्मेवारियों के बीच शौक व हुनर को छोड़ने वाली गृहणियां फिर से सीख रही हैं कथक
स्वस्थ रहने के साथ अपनी अलग पहचान बनाने के लिए कथक सीखने का लिया फैसला
कथक से 62 साल की उम्र में सपनों को उड़ान दे रही हैं रेशा सिंह
सविता। पटना
हर शख्स में एक हुनर छुपा होता है, जो जिम्मेवारियों के बीच दब सी जाती है। लेकिन कभी मरता नहीं। उम्र के किसी पड़ाव पर जब भी मौका मिलता है, इसे जिन्दा करना ही जिन्दगी का असली मजा है। पटना के नृत्यकला मंदिर में दो दर्जन से अधिक महिलाएं कथक सीखकर बचपन के खोए हुए हुनर को मंच दे रही हैं। 40 की उम्र पार करने के बाद रेशा सिंह, रश्मि सिन्हा, तृषा बंका, कविता अग्रवाल और दीप्ति ने कथक से फिर से जीना सीखा है।
ता थई, ता…घुंघरूओं की शोर, पैरों की थाप, मानों सबकुछ मेरे सपनों को पूरा करने के लिए बच रहे हों। मैं बचपन से ही कथक सीखना चाहती थी और शास्त्रीय नृत्य में मुकाम बनाना चाहती थी। बचपन में कथक भी सीखा। लेकिन इस क्षेत्र में कॅरियर बनाने का सपना पूरा नहीं हो सका। 43 साल की उम्र में मैंने फिर से कथक सीखना शुरू किया है। नृत्य और संगीत ने मुझे नया जन्म दिया है। मैं अब तक मां, बेटी और पत्नी के रूप में जानी जाती थी। अब मैं एक कथक नृत्यांगना के रूप में जानी जाती हूं। यह कहना है 43 वर्षीय तृषा बंका है। वह कहती हैं कि शादी के बाद घर-परिवार और बच्चों की जिम्मेवारी ऐसी मिली कि कथक करना, छूट ही गया। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में खुद को व्यवस्त कर ली। अब बच्चे बड़े हो गए हैं, उनके सपने, रास्ते सब अलग हो गए हैं और मैं फिर से अकेली हो गई हूं। इस अकेलेपन में खुद को स्वस्थ रखना और व्यस्त रखना मेरे लिए चुनौती थी। कुछ करने का मन नहीं करता था, मन बोझिल सा हो जाता था। इसलिए मैंने कथक करने का मन बनाया। सीखा तो मन से सीखा, अब मैं नृत्यकला मंदिर में होने वाले परफार्मेंस में भी हिस्सा लेती हूं, साथ में रोटरी क्लब के कार्यक्रमों में भी कथक करती हूं।
मेरी अलग पहचान है
पाटलिपुत्रा की 62 वर्षीय रेखा सिंह कहती हैं कि उन्हें बचपन से कथक पसंद था। लेकिन घर से पढ़ने-लिखने का दबाव था। मैंने खूब पढ़ाई की। पटना विश्वविद्यालय से एमए किया। कई तरह के अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से डिग्री भी ली। सोचा शादी के बाद शौक पूरे करेंगे, लेकिन पति-बच्चों में कैसे समय बित गया, पता नहीं चला। देखते-देखते उम्र के 50 साल निकल गए। पति ने प्रोत्साहित किया तो उन्होंने बचपन के शौक को दोबारा सीखना शुरू किया। वह बताती हैं कथक करने से मन एकाग्र रहता है। एक्सरसाइज भी हो जाता है। इससे वह खुद को स्वस्थ महसूस करती हैं। पहले सिर्फ डॉक्टर की पत्नी के रूप में जानी जाती थी, लेकिन अब एक नृत्यांगना के रूप में पहचान है।
शौक को जिन्दा रखे
जिन्दगी में हर दिन सीखना होता है। ये महिलाएं घर की चहारदीवारी से जब बाहर निकलकर नृत्य करना सीखती हैं तो पूरे लग्न के साथ सीखती हैं। एक अलग जुनून होता है मानो जिन्दगी का एक कोना सूना पड़ा था, उसे गुलजार करना है।
कुमार कृष्णा, कथक ट्रेनर



















































































