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अभी तो मैंने चलना सीखा है हौसलों की उड़ान अभी बाकी है : उषा झा

अभी तो मैंने चलना सीखा है, हौसलों की उड़ान अभी बाकी है। यह कहना है 60 वर्षीय उषा झा का। उषा मधुबनी पेंटिंग की बेहतरीन कलाकार के साथ बिहार में महिला उद्यमियों की प्रेरणा है। बिहार महिला उद्योग संघ की अध्यक्ष होने के साथ एक सफल उद्यमी के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने मधुबनी पेंटिंग के माध्यम से बिहार से विदेशों में अपनी धाक स्थापित की हैं और गर्व से कहती हैं कि कला का हुनर है तो आप कहीं भी जा सकती हैं। वह बताती हैं कि वह मिथिलांचल क्षेत्र की हैं, इस वजह से इस विधा से वाकिफ थी। 27 साल की उम्र में मधुबनी पेंटिंग से आसमा छूने का सपना देखा और प्रोफेशनल तरीके से मधुबनी पेंटिंग बनाना सीखा। लेकिन, यह हुनर उनकी असली पहचान बन जाएगी, यह कभी नहीं सोचा था। पति एके झा सरकारी नौकरी में थे। खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। बस वह अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। दिक्कत यह थी कि पेंटिंग बनाने के बाद बेचे कहां। मार्केट का कोई आइडिया नहीं था। कई बार मन किया कि काम छोड़ दे। क्योंकि प्रोत्साहित करने वाले से अधिक पैर खिंचने वाले लोग थे। एक अच्छी बात यह थी कि पति का साथ हमेशा से रहा। वह अररिया के फारबिसगंज की रहने वाली हैं। अररिया से पटना आयी तो काम का दायरा बढ़ा। गांव के कुछ अच्छे मधुबनी के कलाकारों से मुलाकात हुई और वह पटना में लगने वाले मेलों में जाने लगी। धीरे-धीरे लोगों से पहचान बढ़ी तो मधुबनी पेंटिंग के कद्रदान भी बढ़ने लगे। बच्चे बड़े हो रहे थे। बच्चों की पढ़ाई और शादी में व्यस्त होने के बाद भी कला से जुड़ी रही।

हर साल होली और दशहरा में लगाती हैं बिहार महिला उद्याेग संघ का मेला

उम्र के इस पड़ाव पर उषा झा का उत्साह और काम के प्रति लग्न देखते बनती है। वह बिहार उद्याेग संघ के माध्यम से होली और दशहरा से पहले दो बार महिला उद्यमियों के लिए मेला लगाती हैं। इसमें त्यौहारों से संबंधित कपड़े, पूजा-पाठ के सामान और महिला उद्यमियों द्वारा बनाए गए सामानाें का स्टॉल लगाती हैं। पिछले 30 साल से मेला लगा रही हैं। इससे महिला उद्यमियों के उत्पाद को बाजार देने का अच्छा मंच मिल जाता है। इस मेले में भी मधुबनी पेंटिंग, बावन बूटी, टिकुली आर्ट, मंजुषा आर्ट, काष्ठ कला के अलावे गुड्‌डे गुड़िया कला, टेराकोटा के सामान से मिट्‌टी से जोड़ने का काम कर रही हैं। मेले के माध्यम से बिहार की कला-संस्कृति को समृद्ध करने की कोशिश करती हैं। लेकिन साल 2021 में पति की कोरोना से मौत हो गई। पति की मौत ने उषा झा को पूरी तरह तोड़ दिया। बच्चे अमेरिका में रहते हैं। वह अकेले पड़ गई। इस अकेलेपन को दूर करने के लिए फिर से कूची पकड़ी और काम में व्यस्त हो गई। वह बताती हैं वृद्धावस्था में बीमारी घेरने लगती है, लेकिन सच्ची लगन हो तो बीमारी भी भाग जाती हैं। उन्हें बिहार के कई सम्मानों से पुरस्कृत भी किया गया है।

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