दीघा दूधिया मालदह आम को संरक्षित किया जाए, तभी जीआई टैग मिलेगा

  • दीघा में मात्र 100 आम के पेड़ ही बचे
  • दीघा मालदह को जीआई टैग दिलाने की हो रही पहल

सविता। पटना

दीघा दूधिया मालदह आम को जीआई टैग दिलाने की पहल हो रही है। लेकिन दीघा में अब मात्र 100 पेड़ ही दूधिया मालदह की रह गया है। ये सारे पेड़ भी अब जैसे-तैसे बचे हैं। शहरीकरण में इन पेड़ों की भी बली चढ़ाने की कोशिश जा रही है। इस साल इन पेड़ों अच्छे मंजर आए हैं, लेकिन कृषि विभाग की ओर से दीघा दूधिया मालदह को संरक्षित नहीं किया जा रहा है। यह कहना है दीघा के सुधीर कुमार का। 45 वर्षीय सुधीर कुमार बताते हैं कि आज उनके परदादा द्वारा लगाए गए दीघा दूधिया मालदह आम खत्म हो रहा है और वह कुछ नहीं कर सकते हैं। क्योंकि न जमीन बचा है और न आम के पेड़ हैं। वह भी मुश्किल से आम के पेड़ को बचा पा रहे हैं। उनके पास 90 साल पुराना दीघा दूधिया मालदह का पेड़ है। पेड़ के फल से लदे हैं लेकिन वह पेड़ को टूटने से कैसे बचाए, इसका कोई उपाय नहीं है। मालदह आम को संरक्षित करने के लिए राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पत्र लिखा है। इसके बावजूद कोई पहल नहीं किया जा रहा है।

साल 2014 में सभी सरकारी भवनों में दीघा मालदह लगाने की योजना बनी थी, बिहार बागवानी मिशन की ओर से साल 2014 में दीघा दूधिया मालदह को संरक्षित करने की योजना बनी थी। सभी सरकारी कार्यालय में दो-दो पौधे दूधिया मालदह आम के लगाने की योजना बनाई गई थी। पश्चिम बंगाल से दो करोड़ रुपए के पौधे लाए गए थे। लेकिन अधिकांश पौधे सूख गए।

राजापुल से लेकर दीघा नहर तक लगभग पांच किलोमीटर में फैली थी दीघा मालदह आम की खेती दीघा दूधिया मालदह आम की खेती राजापुल से लेकर दीघा नहर तक पांच किलोमीटर के दायरे में होती थी। भगेरन बाबू के परपोते सुधीर कुमार बताते हैं कि उनके परदादा स्वर्गीय भगेरन बाबू ने आजादी के समय चार सौ पेड़ लगाए थे। उस समय गाय-भैंस काफी संख्या में पाले थे। वे गाय-भैंस के दूध को पेड़ों में डालते थे, इसके कारण इसके दूध की सफेदी फल के छिलके पर आने लगा। इसके कारण आम के छिलके हरा न होकर सफेद होने लगा। इसके कारण इस आम का नाम सिर्फ मालदह न रहकर दूधिया मालदह हो गया। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके छिलके बहुत पतले होते हैं और गुठली बहुत छोटी होती है। 20 साल पहले इस आम को इंग्लैड के आम प्रदर्शनी में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला था, वहां इस आम को पहला स्थान मिला था।

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